Krishna Ne Shishupal Ko Kyon Mara Katha

Krishna Ne Shishupal Ko Kyon Mara Katha

 

Krishna Ne Shishupal Ko Kyon Mara Katha – जानें भगवान कृष्ण ने  महाभारत अपने फुफेरे भाई शिशुपाल का वध क्यों किया। राजसूय यज्ञ, 100 अपराधों की क्षमा, और सुदर्शन चक्र की पूरी कहानी को विस्तार से समझें। कृष्ण ने शिशुपाल को क्यों मारा? 100 अपराधों की क्षमा और सुदर्शन चक्र की कथा

परिचय:

महाभारत की कथाओं में भगवान कृष्ण और चेदि नरेश शिशुपाल के बीच का द्वेष और अंततः कृष्ण द्वारा शिशुपाल का वध एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है। यह घटना केवल एक हत्या नहीं थी, बल्कि धर्म की स्थापना, वचन की पूर्ति और अधर्म के नाश का प्रतीक थी। प्रश्न उठता है कि आखिर कृष्ण ने अपने फुफेरे भाई का वध क्यों किया? इसका उत्तर शिशुपाल के जन्म की कहानी और कृष्ण द्वारा दिए गए एक विशेष वचन में छिपा है।

 

1. बुआ को दिया गया ‘सौ अपराधों की क्षमा’ का वचन

 

शिशुपाल, कृष्ण की बुआ (पिता वासुदेव की बहन) श्रुतश्रवा का पुत्र था। उसका जन्म असामान्य था—उसके तीन नेत्र और चार भुजाएँ थीं।
* चमत्कार और भविष्यवाणी: एक आकाशवाणी हुई थी कि जिस व्यक्ति की गोद में जाने पर उसके अतिरिक्त अंग गायब हो जाएँगे, वही भविष्य में उसका वध करेगा।
* वचन का क्षण: जब बालक शिशुपाल को कृष्ण ने अपनी गोद में लिया, तो उसके अतिरिक्त अंग तुरंत गायब हो गए। यह देखकर शिशुपाल की माता घबरा गईं और कृष्ण से अपने पुत्र के जीवन की भीख माँगी।

* कृष्ण की प्रतिज्ञा: कृष्ण ने अपनी बुआ को आश्वासन दिया कि वह शिशुपाल के सौ (100) अपराधों को क्षमा कर देंगे। लेकिन, यदि उसने 101वीं बार कोई पाप या अपराध किया, तो उसे दंडित किया जाएगा।

2. शत्रुता के मुख्य कारण और शिशुपाल के अपराध

 

समय के साथ, शिशुपाल कई ऐसे कार्य करता रहा, जिसने उसके और कृष्ण के बीच शत्रुता को गहरा किया:
* रुक्मिणी हरण पर क्रोध: शिशुपाल, विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी से विवाह करना चाहता था, लेकिन कृष्ण ने रुक्मिणी का हरण कर उनसे विवाह किया, जिससे शिशुपाल स्वयं को अपमानित महसूस करता था और कृष्ण से ईर्ष्या रखता था।
* विभिन्न राजाओं को परेशान करना: उसने कई धर्मपरायण राजाओं को परेशान किया और उनकी संपत्ति लूटी।
* अधर्म के पक्ष में खड़ा होना: वह हमेशा कृष्ण के परम शत्रु जरासंध और दुर्योधन जैसे अधर्मी राजाओं का पक्ष लेता था।
हर बार, कृष्ण ने अपनी प्रतिज्ञा के कारण उसके अपराधों को चुपचाप क्षमा कर दिया।

 

3. राजसूय यज्ञ और 101वाँ अपराध

 

वध की अंतिम घटना पांडवों द्वारा आयोजित राजसूय यज्ञ के दौरान हुई।
* अग्रपूजा का सम्मान: यज्ञ की समाप्ति पर, सभा में उपस्थित सबसे योग्य व्यक्ति की अग्रपूजा (सबसे पहले पूजा) करने का निर्णय लिया गया। भीष्म पितामह के सुझाव पर, यह सम्मान भगवान कृष्ण को दिया गया।
* शिशुपाल का अपमान: कृष्ण को यह सम्मान दिए जाने पर शिशुपाल क्रोध से भर उठा। उसने भरी सभा में कृष्ण को अपशब्द कहना शुरू कर दिया। उसने कृष्ण को कुलकलंक, कायर, और अनैतिक कहकर उनका घोर अपमान किया।
* गिनती पूरी: कृष्ण ने शांत रहकर शिशुपाल के हर अपशब्द को गिना। जैसे ही शिशुपाल ने 100 अपशब्द पूरे किए, कृष्ण ने उसे अंतिम चेतावनी दी कि वह रुक जाए।
* वध: अहंकार में डूबे शिशुपाल ने कृष्ण का अपमान जारी रखा और 101वाँ अपशब्द कह दिया। वचन की सीमा टूटते ही, कृष्ण ने तुरंत अपने सुदर्शन चक्र का आह्वान किया और पलक झपकते ही शिशुपाल का सिर धड़ से अलग कर दिया।

 

4. वध का महत्व (मोक्ष की प्राप्ति)

 

शिशुपाल का वध केवल एक राजनीतिक या व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं था, बल्कि धर्म की रक्षा का एक कार्य था। वध के बाद, शिशुपाल के शरीर से एक दिव्य ज्योति निकली और वह भगवान कृष्ण के शरीर में समा गई।
* मोक्ष: पौराणिक कथाओं के अनुसार, शिशुपाल और दंतवक्र पूर्वजन्म में वैकुंठ के द्वारपाल जय और विजय थे, जिन्हें शाप के कारण तीन जन्मों तक कृष्ण के विरोधी के रूप में जन्म लेना पड़ा था। शिशुपाल को कृष्ण के हाथों मृत्यु प्राप्त होने से उसे मोक्ष प्राप्त हुआ।
कृष्ण ने यह सिद्ध कर दिया कि धर्म की रक्षा के लिए वह किसी भी रिश्ते की सीमा को तोड़ सकते हैं, लेकिन अपनी प्रतिज्ञा का मान रखना भी उनके लिए सर्वोपरि था।

 

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यह संग्रह मैंने दादा दादी के मुख से सुना था जिसे आप सभी के समक्ष प्रस्तुत किया है |
धन्यवाद ,    कृष्णावती कुमारी अध्यापिका (KVS)

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