Mera Bachapan Par Kavita

Mera Bachapan Par Kavita|बचपन के दिन

Mera Bachapan Par Kavita- बचपन की सुनहरी यादों और मासूमियत को समर्पित एक दिल छू लेने वाली कविता। जीवन के सबसे प्यारे दिनों को याद करें। भावुक कर देगी यह हिंदी रचना। “बचपन के दिन,” “खेल-खिलौने,” और “मासूमियत” हमारे ज़माने में  धूल  और मिटटी के  खिलौने होते थें |

 

मेरा बचपन

“बचपन के दिन,” “खेल-खिलौने,” और “मासूमियत”

वो निमिया के ठाव , वो पीपल के छाव
वो गन्ने की चोरी,वो गोबर  की  होली।
वो बारिश का पानी, वो कागज़  की कश्ती
वो सखियों की टोली ,और ढेरों  मस्ती ।

 

वो  चकवा  चकैया, वो गुली- डंडे का खेल।
वो आपस की तकरार,वो पल भर में मेल।
वो कौवा उड़ भैंस उड़ ,खेलें हम साथ।
जिसकी उड़ी भैंस तो,खाये दो चार हाथ।

 

कभी पोखर नहाएं ,कभी पाकवा इनार।
कभी नहरी में कूदें, कभी फाने दीवार
वो मिट्टी का खिलौना,वो दिवाली  का गांव।
वो दिया की चोरी,  विहाने दबे  पांव।

 

कहीं कोई देखे ना,जाने ना पावे
धीरे बोल भाई,कोई सुने ना पावे।
बनाया तराजू , सजाया दुकान
ऐ चुन्नू,ऐ  मुन्नू,खरीदो सामान।

 

मेरे खेल का ना,कोई मोल था।
ना रिमोट कार था,ना हेलीकॉपटर था।
वो गर्मी की छुट्टी,वो नानी का गांव।
वो नाना की लाठी, वो बरगद का छांव

 

जब याद आती है,बचपन तिहारे।
अश्रु से भर आते,नैना (आंख) हमारे
मुझ पर दया कर दो,हे पालन हारे ।
कोई बाबा लौटा दो,बचपन हमारे।

हृदय से धन्यवाद पाठकों    रचना -कृष्णावती कुमारी

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सादगी और संयुक्त परिवार (Simplicity and Joint Family)

 

* संयुक्त परिवार: ज़्यादातर बच्चे बड़े संयुक्त परिवारों में पलते थे, जहाँ दादा-दादी, चाचा-चाची, और चचेरे भाई-बहन साथ रहते थे। इससे बच्चों को बड़ों का मार्गदर्शन और देखभाल मिलती थी, और रिश्तों की समझ गहरी होती थी।
* सीमित साधन: आज के विपरीत, खेलने के लिए महंगे या इलेक्ट्रॉनिक खिलौने नहीं थे। जीवन में भौतिक सुख-सुविधाओं की कमी थी, लेकिन संतोष का भाव अधिक था।

🪁 खेल और मनोरंजन (Games and Entertainment)

 

* बाहरी खेल (Outdoor Games): सारा मनोरंजन घर के बाहर, प्रकृति के बीच होता था। खेल में दौड़ने, भागने और शारीरिक मेहनत पर ज़ोर होता था।
* मुख्य खेल: गिल्ली-डंडा, कंचे (Marbles), लुका-छिपी (Hide and Seek), खो-खो, रस्सी कूदना, लट्टू घुमाना और पतंग उड़ाना बहुत लोकप्रिय थे।
* स्व-निर्मित खिलौने: बच्चे खुद ही लकड़ी, मिट्टी, या टूटी-फूटी चीज़ों से अपने खिलौने बनाते थे।
* कहानियाँ: दादा-दादी से कहानियाँ सुनना मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन था। ये कहानियाँ अक्सर पौराणिक कथाओं (Mythology), लोक कथाओं और नैतिक मूल्यों पर आधारित होती थीं।
* रेडियो: मनोरंजन का प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक साधन रेडियो था, जिस पर बच्चे विविध भारती के कार्यक्रम, नाटक और गाने सुनते थे।

🏫 शिक्षा और अनुशासन (Education and Discipline)

 

* गुरुजन का सम्मान: स्कूलों में अनुशासन बहुत सख्त होता था, और गुरु या शिक्षक का सम्मान सर्वोपरि माना जाता था।
* ज्ञान पर ज़ोर: शिक्षा का ध्यान ज्ञान अर्जित करने और चरित्र निर्माण पर अधिक था, न कि केवल परीक्षा पास करने पर।
* सीमित स्कूल: गाँव और छोटे शहरों में अच्छे स्कूलों तक पहुँच सीमित थी।

🧑‍🤝‍🧑 समुदाय और सहयोग (Community and Cooperation)

 

* सामुदायिक जीवन: बच्चे पड़ोस और मोहल्ले में एक साथ पलते थे। उनके दोस्त गली या मोहल्ले के होते थे, और बच्चे दिन का अधिकांश समय पड़ोसियों के बच्चों के साथ खेलते और बड़े होते थे। हमारे ज़माने में moble टेलीविजन नहीं होता था | नागे पांव सरे खेत-खलिहान बाग-बगीचा सब जगह खेलकूद कर आ जाते थे|

* सामाजिक ज़िम्मेदारी: बचपन से ही बच्चों को घर और खेत के छोटे-मोटे कामों में मदद करना सिखाया जाता था।
* मेल-जोल: शादी, त्यौहार और सामुदायिक समारोहों में सभी बच्चे एक साथ हिस्सा लेते थे, जिससे उन्हें परंपराओं और सामाजिक मूल्यों की गहरी समझ मिलती थी।
पहले का बचपन खुली हवा, मिट्टी, रिश्तों की गर्माहट, और सादगी से भरा एक ऐसा दौर था जहाँ संसाधन कम थे, लेकिन जीवन की गुणवत्ता (Quality of Life) को अक्सर लोग आज से अधिक शांत और संतोषजनक मानते हैं।

 

रचना -कृष्णावती कुमारी अध्यापिका (KVS)

हृदय से धन्यवाद पाठकों  आप सभी का प्यार अपेक्षित है |आप हमारी कमी बताये ताकि अपनी कमी को सुधर सकूँ |

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