Raghav dheere Chalo Vivah Geet Lyrics

Raghav dheere Chalo Vivah Geet Lyrics|राघव धीरे चलो ससुराल गलियां

 

Raghav dheere Chalo Vivah Geet Lyrics– राघव धीरे चलो ससुराल गलियां: श्री राम-सीता विवाह का मधुर पारम्परिक विवाह गीत (गाली गीत)। मिथिला की सखियों के प्यारे बोल और भजन, हिंदी लिरिक्स में।यह विवाह गीत श्री राम और सीता जी के विवाह के दौरान मिथिला की सखियों द्वारा गाया जाता है।

राघव धीरे चलो ससुराल गलियां

 

राघव धीरे चलो ससुराल गालियां (विवाह गीत)
स्थायी (Chorus):
राघव धीरे चलो ये ससुराल गलियां,
हे पहुना धीरे चलो ये ससुराल गलियां।
जी ससुराल गलियां, हे पहुना धीरे चलो ना
ये ससुराल गलियां।
अंतरा 1:
मिथिलापुर की नारी नवेली,
मोहित छवि लखि रंगरलिया।
हे जी मोहित छवि लखि रंगरलिया,
पहुना बचके चलो ना ये ससुराल गलियां।
राघव धीरे चलो…
अंतरा 2:
तुम ही बिलोकी न नज़र लगावें,
जनक नगर की सब सखियाँ।
हे जी जनक नगर की सब सखियाँ,
पहुना बचके चलो ना ये ससुराल गलियां।
राघव धीरे चलो…
अंतरा 3:
पीत ऊपरना कानन कुंडल,
लटकत माथे मोर लरिया।
हे जी लटकत माथे मोर लरिया,
पहुना बचके चलो ना ये ससुराल गलियां।
राघव धीरे चलो…
अंतरा 4:
गिरिधर प्रभु लखि प्रेम विवस्भय,
रब राखें ज्यों कमल कलियां।
हे जी रब राखें ज्यों कमल कलियां,
पहुना बचके चलो ना ये ससुराल गलियां।
राघव धीरे चलो…

 

(पहुना का अर्थ है मेहमान/दामाद, जो यहाँ श्री राम को संबोधित किया जा रहा है। गालियां या गलियां का अर्थ यहाँ वह रास्ता या गली है जहाँ से दूल्हा आता है, और साथ ही गालियों वाले गीत से भी है|

 श्री राम और माता सीता का विवाह प्रसंग भारतीय संस्कृति, विशेष रूप से रामचरितमानस और वाल्मीकि रामायण में वर्णित, सबसे पवित्र और सुंदर अध्यायों में से एक है।

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👑 श्री राम-सीता विवाह का पावन वर्णन

 

1. जनक का प्रण (वीर-शुल्क)

राजा जनक (मिथिला के राजा) ने प्रतिज्ञा की थी कि वे अपनी पुत्री सीता का विवाह उसी वीर से करेंगे जो भगवान शिव के विशाल धनुष ‘पिनाक’ को उठाकर उस पर प्रत्यंचा (डोरी) चढ़ा देगा। इस धनुष को उठाने की शक्ति साधारण मनुष्य में नहीं थी। यह प्रण (वीर-शुल्क) इसलिए लिया गया था क्योंकि बचपन में सीता ने खेल-खेल में इस धनुष को उठा लिया था, जिसे बड़े-बड़े योद्धा भी नहीं हिला पाते थे।

2. स्वयंवर का आयोजन

* विश्वामित्र का आगमन: महर्षि विश्वामित्र, भगवान राम और लक्ष्मण को अपने साथ मिथिला लेकर आए। राम और सीता ने पहली बार पुष्प वाटिका में एक-दूसरे को देखा, जहाँ दोनों के हृदय में प्रथम प्रेम का भाव जाग्रत हुआ।
* स्वयंवर सभा: जनकपुरी में स्वयंवर का भव्य आयोजन हुआ। देश-विदेश के अनेक पराक्रमी राजा और राजकुमार उस पिनाक धनुष को तोड़ने के लिए आए, लेकिन कोई भी उसे उठा तक नहीं सका। सभी राजाओं के असफल होने पर राजा जनक बहुत दुखी हुए।

3. धनुष भंग (टूटने का प्रसंग)

* गुरु की आज्ञा: राजा जनक की निराशा को देखकर, महर्षि विश्वामित्र ने राम को शिव धनुष को तोड़ने की आज्ञा दी।
* धनुष पर चढ़ना: गुरु की आज्ञा पाकर, श्री राम ने अत्यंत सहजता से धनुष को उठा लिया। जैसे ही उन्होंने उस पर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया, धनुष ‘पिनाक’ भयंकर ध्वनि के साथ तीन खंडों में टूट गया।* सीता द्वारा जयमाल: धनुष टूटने पर पूरी सभा जय-जयकार से गूंज उठी। माता सीता ने राम के गले में जयमाला डाली, और इस प्रकार उनका विवाह निश्चित हुआ।

4. परशुराम का क्रोध

धनुष टूटने की आवाज सुनकर भगवान परशुराम क्रोधित होकर सभा में आए। वे शिव के परम भक्त थे। लक्ष्मण और परशुराम के बीच तीखी बहस हुई, जिसे राम ने अपनी विनम्रता और मधुर वचनों से शांत किया।

5. विवाह की रस्में (बारात और कन्यादान)

* बारात का आगमन: महाराज जनक ने अयोध्या जाकर राजा दशरथ को संदेश भेजा। दशरथजी अपने तीनों पुत्रों—भरत, शत्रुघ्न, और लक्ष्मण—तथा गुरु वशिष्ठ के साथ भव्य बारात लेकर मिथिला पधारे।
* विवाह संस्कार: विवाह मंडप में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सभी रस्में निभाई गईं। राम का विवाह सीता से हुआ, और उसी समय बाकी तीनों भाइयों का विवाह भी हुआ:
* लक्ष्मण का विवाह उर्मिला से।
* भरत का विवाह मांडवी से।
* शत्रुघ्न का विवाह श्रुतकीर्ति से।

* पाणिग्रहण और कन्यादान:

विवाह के दौरान माता सुनयना (सीता की माता) ने दूल्हे राम का परछन किया (जिस समय “राघव धीरे चलो ससुराल गलियां” जैसे गीत गाए गए), और राजा जनक ने लोक और वेद की रीति से कन्यादान किया।
* फेरे: सात फेरे हुए और इस प्रकार राम और सीता पवित्र विवाह बंधन में बंध गए।
राम-सीता का यह विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि मर्यादा, शील, और प्रेम के आदर्श का मिलन था, जिन्हें भारतीय समाज में आदर्श दंपत्ति के रूप में पूजा जाता है।

संग्रहिता -कृष्णावती कुमारी अध्यापिका (KVS)

 

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