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Bhagawan Vishvkarma Ki Kahani

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Bhagawan Vishvkarma Ki Kahani|भगवान विश्वकर्मा की कहानी 

भगवान विश्वकर्मा को इस शृष्टि का प्रमुख वास्तुकार माना जाता है | इस दिन इसीलिए  सभी कल कारखानों की पुजा होती है | आइये जानते हैं , भगवान विश्वकर्माजी की कहानी| उनका योगदान देवताओं के लिए शहर और महल बनाने में किस प्रकार रहा है |जिसके कारण उन्हें ‘देव सिद्धि ‘ के नाम से भी जाना जाता है |

विश्वकर्मा की उत्पाति-

एक कथा के अनुसार साक्षात विष्णु जी सागर में शेष शय्या पर प्रकट हुवे| उनके नाभि कमल से चतुर्मुख ब्रहमाजी दृष्टि गोचर हो रहे थे | ब्रहमाजी के पुत्र ‘धर्म’ , धर्म के पुत्र ‘वासुदेव’ हुए| यह भी माना जाता है कि धर्म कि पत्नी ‘वस्तु’ से उत्पन्न ‘वास्तु’ सातवें पुत्र थे जो शिल्पशास्त्र के प्रगाढ़ विद्वान थे |उनकी पत्नी ‘अंगीरसी’ से विश्वकर्मा जी का जन्म हुआ| अपने पिता की तरह ही विश्वकर्मा जी भी वास्तुकला के अद्वितीय आचार्य बनें |

स्वर्ग निर्माता-

ऐसा माना जाता है की सिर्फ शहर और महल ही नहीं वह स्वर्ग के भी निर्माता है |उन्होंने जिन शहरों और महलों के निर्माण में योगदान दिया है|उनमें  शामिल है सोने की लंका ,यह बात तो हम सभी जानते हैं कि रावण की नगरी सोने की थी|परंतु क्या आप जानते हैं, कि उस सोने की नगरी का निर्माण भगवान विश्वकर्मा जी ने किया था |

भगवान शिव के लिए  सोने का महल निर्माता-

भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के बाद शिव जी ने विश्वकर्मा जी से एक सोने का सुंदर महल बनाने के लिए कहा : शिव जी के कहने पर विश्वकर्मा जी ने उनके लिए एक भव्य सोने का महल बनाया |महल के उद्घाटन समारोह में उन्होंने पुलस्ति ऋषि को गृह प्रवेश की पूजा के लिए आमंत्रित किया था | समारोह समाप्त हुआ |तब भगवान शिव ने पुलस्ति ऋषि से से पूछा:, कि ,हे ऋषि महाराज आपको दक्षिणा में क्या चाहिए?

तब पुलस्ति ऋषि ने दक्षिणा के रूप में उसी सोने के महल को मांग लिया जिसका गृह प्रवेश पूजा करवाया था |भला शिव को क्या फिकर, उन्होंने बिना संकोच किए पुलस्ति ऋषि को सोने का महल दे दिया |अब इस महल को ऋषि ने अपने पोते कुबेर को भेट में दे दिया | लेकिन दुर्भाग्य वश रावण जो कुबेर के सौतेले भाई थे | उस महल को कुबेर से छिन लिया |यह वही महल है जिसे हम सोने की लंका के नाम से जानते हैं |

हस्तीनापुर का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने ही किया था |

हस्तीनापुर जो कौरवों के कुरु साम्राज्य की राजधानी थी |उसका भी निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने ही किया था | इतना ही नहीं  भले ही भगवान श्री कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ था |परंतु उनकी कर्म भूमि द्वारिका थी |जिसका निर्माण खुद विश्वकर्मा भगवान ने किया था |श्रीकृष्ण के कहने पर विश्वकर्मा ने यमुना नदी के पश्चिमी किनारे पर इंद्रप्रश्त का निर्माण किया था |इससे पहले खांडव प्रश्त के नाम से भी यह जाना जाता है, जो कि एक बंजर जमीन थी |इस बंजर जमीन की उन्नति पांडवों ने की |यह बंजर जमीन धृतराष्ट्र ने उन्हें भेट में दिया था |

अलकपुरी का निर्माण –

इसके बाद जब कुबेर धन के देवता बने तब वह विश्वकर्मा जी के पास एक निवास स्थान के लिए गए |तब विश्वकर्मा जी ने उनके लिए अल्कापुरी पर्वत पर एक शानदार शहर बनाया , जो आज अल्का के नाम से जाना जाता है |

पुष्पक विमान और देवताओं के लिए औंजर निर्माता –

शहर और महलों के साथ- साथ  देवताओं के रथ जैसे- पुष्पक विमान|बुरे समय में जब कुबेर जी असहाय थे तब उनके लिए  विश्वकर्मा भगवान ने एक पुष्पक विमान बनाया जो उनके आदेशों के अनुसार जहां चाहे उड़ कर जाने में सहायता करता था | देवताओं के लिए शस्त्र जैसे – विजया -धनुष| इस धनुष का निर्माण विश्वकर्मा जी  ने भगवान शिव के कहने पर  देवों के देव इन्द्र के लिए किया था | भगवान इन्द्र ने इस धनुष को परशुराम जी को भेट में दिया था |इस धनुष को परशुरामजी  ने अपने शिष्य कर्ण को दिया था | जब कर्ण की मृत्यु हो गयी तो फिर वह धनुष परशुराम जी के हाथ में आ गया |

वज्र निर्माण –

एक बार वृत्रा नामक दानव ने इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया था |उसे ब्रहमा जी से यह वरदान मिला था कि उसे पंचत्व व लकड़ियों से बने किसी भी शस्त्र से मारा नहीं जा सकता | जिसके कारण उसे देवों को हराना असंभव हो गया था |इन्द्र देव ने असहाय होकर विष्णु जी से मदद मांगी |तब विष्णु जी ने उन्हें  ऋषि दधीचि जी से मदद मांगने के लिए कहा: और यह सलाह दी कि वित्रा का बद्ध सिर्फ और सिर्फ  ऋषि के रीड़ की हड्डी से बने शस्त्र से ही हो सकता है |तब जाकर वज्र  शस्त्र का निर्माण हुआ | वज्र वहीं  शस्त्र है जिसे इन्द्र ने वित्रा का वद्ध किया था |

भाद्र संक्रांति व कन्या संक्रांति

इस तरह  विश्वकर्मा पूजा भादो महीने के आखिरी दिन 17 सितंबर को की  जाती है |जिसे भाद्र संक्रांति अथवा कन्या संक्रांति भी कहा जाता है | विश्वकर्माजी  मुख्य रूप से अभियन्ताओं के देवता माने जाते हैं | इस वजह से श्रमिक इन्हें देवता मानते है| विश्वकर्मा जयंती के दिन श्रमिक आमतौर पर कारखानें बंद रखते हैं | कल कारखानों और अपने औंजरों की पूजा करते हैं | अन्य आम आदमी भी इस दिन अपने वाहन को विश्राम देते हैं| सभी धूम धाम से पुजा अर्चना करते है ताकि व्यवसाय व व्यापार में वृद्धि हो | इस दिन विश्वकर्मा जी के साथ उनके वाहन हाथी की भी पूजा की जाती है |

यह भी पढ़ें :

  1. हरितलिका व्रत कथा

2. गनेश चतुर्थी कथा

3.हनुमान जयंती कविता 

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