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Sankat Chauth Ki Katha

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Sankat Chauth Ki Katha|संकट चौथ की कथा

Sankat Chauth Ki Katha- ऐसे तो भारत त्योहारों और व्रतों का देश कहा जाय तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी |सम्पूर्ण विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है, जहां सभी देवी देवताओं की जन्म स्थली हैं | हिन्दू धर्म अपने आपमें सम्पूर्ण है,जहाँ देवी देवताओं की नित्य पूजा पाठ होती है|इसी कड़ी में Sankat Chauth Ki Katha आज हम सभी निम्नवत जानेंगे जो इस प्रकार है |

एक समय की बात है |एक साहूकार दंपति जो कि अपने घर में धर्म पुण्य बिल्कुल नहीं करते थे |जिसके कारण उनके कोई भी संतान नहीं हुई |एक दिन पड़ोस में साहूकारणी की पड़ोसन संकटी चौथ की कहानी सुन रही थी|तब उसी समय साहूकारनी उनके घर पहुँच गई|देखा, पड़ोसन कुछ सुन रही हैं | पड़ोसन से पूछा आप क्या सुन रहीं हैं ?

पड़ोसन ने कहा :आज चौथ व्रत है ,इसलिए संकट व्रत की कथा सुन रही हूँ | साहूकारणी ने पूच्छा:इससे क्या होता है? पड़ोसन ने जवाब दिया :इस व्रत को सुनने से अन्न धन सुख समृद्धि और संतान की प्राप्ति होती है |यह सुनकर साहूकारणी के हृदय में प्रबल इच्छा जगी|हे! प्रभु जिस दिन मैं गर्भवती हो जाऊँगी तो सवा सेर का तिलकुटा करूंगी|कुछ दिन बाद गर्भवती हो गयी |

तब उसने कहा यदि  मुझे बेटा हो जाएगा, तो मैं ढाई  सेर का तिलकुटा करूंगी और चौथ का व्रत करूंगी | नौ महीने बाद उसे बेटा हो गया |उसके बाद उसने कहा की हे!चौथ माता जब मेरे बेटे की शादी हो जाएगी ,तब मैं सवा मन का तिलकुटा करूंगी |ऐसे ही समय बीतता गया और बेटे के व्याह का समय भी आ गया |

जब वे लोग बेटे का व्याह करने चले तो चौथ माता और विनायक जी ने आपस में बात किया, कि जबसे यह महिला गर्भवती हुई| तभी से बार-बार तिलकुटा चढ़ाने की बात बोलती रही है |लेकिन अब तो यह बेटे का व्याह करने जा रही है |कभी भी न इसने तिलकुटा किया नहीं कभी चौथ का व्रत किया |

यदि हम अपना चमत्कार नहीं दिखाएगें तो कलियुग में हमें कोई नहीं मानेगा |ऐसा करते हैं ,इसके बेटे को फेरों में से ही उठा लेते हैं |ऐसा ही हुआ |जैसे ही बेटे ने तीन फेरे पूरे किए चौथ माता गरजती हुई आई और दूल्हे को फेरो से उठाकर पीपल के पेड़ पर बैठा दीं | व्याह के माहौल में हाहाकार मच गया |दूल्हे को लोगों ने चारों तरफ ढूंढा |दूल्हा कहीं नहीं मिला |

इस बात को हुवे  बहुत समय बीत गए |होली आई और होली के बाद गणगौर कि पूजा शुरू हो गयी |गाँव कि लड़कियाँ गणगौर पूजने के लिए गाँव के बाहर दूभ लाने जाती, तब पीपल पर बैठा साहूकारणी का बेटा कहता, कि हाये मेरी आधी दुलहन| साहूकारणी कि बेटी डर कर सूखने लगी |यह देखकर उसकी माँ ने बोला :बेटी मैं तो तुम्हें अच्छी तरह खिला पीला रही हूँ, फिर भी तुम्हारा शरीर क्यों सूखते जा रहा है ?

तब बेटी पूरी कहानी बताती है, माँ जब मैं दूभ लाने जाती हूँ उस समय पीपल के पेड़ से आवाज आती है, कि आ मेरी आधी दुलहन |उसने दूल्हे जैसे कपड़े पहने हैं |मेहदी लगा रखी है और सेहरा भी बढ़ रखा है |तब उसकी माँ वहाँ गईं |देखा, कि उसका ही जमाई वहाँ पेड़ पर बैठा है |फिर लड़की कि माँ गुस्से से बोली :मेरी बेटी को अधव्याही करके छोड़ दिया और अब यहाँ बैठे क्या कर रहे हो?अब मेरी बेटी क्या करेगी बोलो |

लड़का बोला: मैं यहाँ अपने मन से थोड़े बैठा हूँ |मुझे तो चौथ माता और गणेश जी ने यहाँ लाकर रखा है | मेरी माँ ने उनका तिलकुटा और व्रत करने के लिए बोला था, जो उनहोंने किया नहीं |जिसके कारण गणेशजी और चौथ माता नाराज होकर मुझे उठाकर यहाँ रखा हैं| यह सुनकर लड़की की माँ और लड़की दोनों लड़के के माँ के पास गए और पूच्छा: क्या आपने चौथ माता और गणेश जी से कुछ बोला था |साहुकरनी ने बोला :हाँ हमने तिलकुटा बोला था |

तब साहूकारणी ने हाथ जोड़कर बोला हे! चौथ माता यदि मेरे बेटा आप वापस आ जाएगा तो मैं आपको ढाई मन का तिलकुटा करूंगी |लड़की वालों ने भी ढाई मन का तिलकुटा चढ़ाने को कहा :उसके बाद गणेशजी चौथ माता राजी हो गए और वापस लाकर फेरों में बैठा दिया |धूम-धाम से बेटे का व्याह हो गया |दोनों ने उसी वक्त ढाई मन का तिलकुटा किया |

हाथ जोड़कर साहूकारणी ने कहा:हे! चौथ माता आपके कृपा से ही मेरे बेटे बहू वापस आए हैं |अब मैं प्रति वर्ष तिलकुटा करके आपका व्रत करूंगी |इस तरह साहूकारणी ने इस बात को पूरे गाँव में ढिढोरा पिटवा दिया कि सब कोई तिलकुटा करके चौथ का व्रत करें |हे! चौथ माता जैसे उनके बेटे बहू को मिलाया वैसे सबके बेटे बहू को मिलाना |

गणेश जी की कहानी     

एक देवरानी देठानी थी |देवरानी के घर में बहुत धन था| लेकिन जेठानी बहुत गरीब थी |जेठानी गणेशजी की आराधना बड़े श्रद्धा से किया करती थी |वो अपने देवरानी के घर आटा पीसने जाया करती थी |जिस कपड़े से आटा छानती थी ,वह कपड़ा अपने घर लेकर जाया करती थी |उसे झाड़कर उसमें से जो आटा निकलता था उससे रोटी बनाकर अपने पति को खिला देती थी |

एक दिन देवरानी के बच्चों ने देख लिया और अपनी माँ से कहा :माँ ताई अपना आटा छानने वाला अपने घर लेकर जाती है |और उसमें से आटा छानकर उससे रोटी बनाकर ताऊजी को खिलाती है |यह बात सुनकर देवरानी को बहुत गुस्सा आया और उसने अपनी जेठानी से कहा :जब हमारे घर से जाओ तो आटा छानने वाला कपड़ा मेरे घर ही रखकर और हाथ धोकर जया करो |

जेठानी ने वैसा ही किया |घर गई तो पति ने कहा कि मुझे रोटी बनाकर दो |उसने कहा कि आज तो देवरानी ने कपड़ा भी नहीं लाने दिया |ऊपर से हाथ भी धुलवाकर भेजे |रोटी मैं कहाँ से बनाकर दूँ ? इस पर पति आग बबूला हो गया और गुस्से में उसे डंडे से बहुत मारा |वो गणेश जी का नाम लेते हुवे रोते- रोते सो गई |

सपने में गणेश जी आए और बोले तुम क्यो सो रही हो ?उसने कहा मुझे मेरे पति ने मारा |गणेश जी ने पूच्छा क्यों मारा ? उसने बताया आज मेरी देवरानी ने आटा छानने वाले कपड़े नहीं लाने दिया जिसमे से निकले आटा से पति को रोटी बनाकर खिलाती थी |आज नहीं खिला पाई क्योंकि देवरानी ने आटा छाननेवाला कपड़ा नहीं लाने दिया| ऊपर से हाथ भी धुलवा लिया|आप ही बताएं मैं कहा से रोटी बना कर देती |

गणेश जी ने कहा :कोई नहीं मैं आज सबके घर से ढेर सारा तिलकुट खाकर आया हूँ |मुझे सौच करने की इच्छा हो रही है कहाँ करूँ ?उसने कहा :सारा घर खाली है| आपकी मर्जी जहां चाहें वहाँ हल्का हो सकते हैं |गणेशजी हल्का होलिए |उसके बाद उन्होंने कहाँ:हल्का तो हो लिया| परंतु पोछू कहाँ :तब जेठानी गुस्से में बोली :मेरे सिर में पोछ लीजिये |

सुबह उठी तो देखा चारों तरफ हीरा जेवहरात और धन भरा हुआ है |लगी बटोरने |देवरानी के घर जाने में देर हो गई |इतने में देवरानी के बच्चे बुलाने आये|बच्चों ने देखा तो ताई धन बिटोरने में लगी है | बच्चे दौड़े-दौड़े गए |अपनी माँ को बताया कि ताई के घर में तो बहुत सारा धन हो गया है |अब यह सुनकर देवरानी जेठानी के घर गई और पूछा कि आपके घर इतना सारा धन कैसे आया |

जेठानी ने सारा वाक्या देवरानी को बताया कि यह सारा धन गणेश जी ने कैसे दिया |यह सुनकर देवरानी जल उठी |अपने घर गयी और अपने पति से बोली मुझे डंडे से खूब मारो | जेठानी के पति ने उसे डंडे se खुब मारा तो उसके पास बहुत सारा धन हो गया | उसका पति ने बोला अरे धन की भूखी, तेरे पास किस चीज कि कमी है | लेकिन उसने जिद की नहीं माना | पति ने वैसा ही किया,खूब मारा |तब अपना सारा मकान खाली कर के सो गई |गणेश जी आए और बोले मैं आज बहुत सारा तिलकुटा खाया हूँ |

हल्का होना चाहता हूँ, कहाँ : निपटु, देवरानी बोली सारा घर तो खाली है |जहां चाहेंवहाँ हल्का हो लीजिये |उसका तो घर छोटा सा था| मेरा घर तो बहुत बड़ा है |गणेशजी हल्का होकर बोले – अब पोछू कहाँ :गुस्से में बोली, मेरे सिर में | उसके सिर में पोंछकर गणेश जी अंतर्ध्यान हो गए |सुबह उठी तो देखा चारों तरफ गंदगी और बदबू फैला हुआ है|

गणेश जी से बोली :हे! गणेश जी यह मेरे साथ आपने छल क्यों किया | यह अपनी सारा माया समेटिए | गणेशजी ने कहा: तुमने धन के लिए मार खाया | उसने धर्म के लिए मार खाया | तुम्हारे पास लालच है, और तुम्हारे जेठानी के पास धर्म था | एक ही उपाय है,इस गंदगी को मैं तभी हटाऊँगा,जब तुम अपने धन मे से अपने जेठानी को आधा दोगी|देवरानी ने जेठानी को आधा धन दिया| तब गणेशजी ने अपनी माया समेटा |

इसीलिए लालच नहीं करना चाहिए |लालच का परिणाम हमेशा गलत होता है |

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