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Ghamand Ka Ant Kaise Huwa

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Ghamand Ka Ant Kaise Huwa|घमंड का अंत

Ghamand Ka Ant Kaise Huwa- आज हम इस पोस्ट में जानेंगे घमंड व्यक्ति की प्रगति को कैसे बाधित करता है|घमंड से बड़े -बड़े ज्ञानी एवं ऋषि मुन्नी भी अछूते नहीं रहे|भगवान शिव ने ऐसे अनेक लोगों के अभिमान को नष्ट करके उन्हें पतन से बचाया है|आइये निम्नवत इसी संदर्भ में एक वाक्या से रूबरू होते हैं |

 प्राचीन काल में दारुकवन नाम का एक बहुत ही सुन्दर घना वन था |उस वन में कई झीलें एवं तालब था |जिससे उस वन की सुंदरता बढ़ी हुई थी|रसीले और स्वादिष्ट फलों के वृक्ष हर समय फलों से लदे रहते थे |वन में वृक्षों की शाखाओं पर भांति -भांति की चिड़ियों ने अपने घोसले बनाए हुवे थे|उनकी मीठी आवाज से वन गुंजित रहता था|वन में चारों तरफ सुख शांति का वास था |

दारुकवन में बहुत सारे ऋषिमुनी अपनी-अपनी कुटियां बनाकर रहते थे |वे अपनी पत्नी बच्चों सहित आनंद के साथ रह रहे थे |उनका जीवन सुखी पूर्वक बीत रहा था| जब ऋषि-मुन्नी तपस्या में लीन होते थे, तब उनकी पत्नियां घर के काम काज में व्यस्त हो जाती थीं |इतना ही नहीं घर के काम के अलावा अपने पतियों के आध्यात्मिक कामों में भी हाथ बंटातीं|

विवाह से पूर्व कई स्त्रियाँ भगवान शिव की परम भक्त थीं, परंतु जैसे ही विवाह हुआ समयाभाव और पति के मना करने पर उन्होंने भगवान शिव की पूजा अर्चना छोड़ दीं| उनके पति सोचते थे,कि वे महान हैं|अतः उनकी पत्नियों को उनकी ही पूजा करनी चाहिए|वे हमारे रहते किसी और की पूजा क्यों करें?

हम क्या किसी से कम हैं|उन सभी ने अपनी पत्नियों से कहा, “एक विवाहित स्त्री के लिए उसका पति हीं उसका भगवान होता हैं|फिर तुम लोग शिव की पूजा में अपना समय क्यों नष्ट कर रही हो? घर का सारा काम और पूरे उतरदायित्व और कर्तव्य-निष्ठा के साथ करना ही तुम्हारा सच्ची पूजा है |”

इसीलिए सभी की पत्नियों ने अपना पूरा समय घर के कार्यों के लिए समर्पित कर दिया था |वे अपने घर से संबन्धित उत्तरदायित्वों के निर्वहन में ही व्यस्त हो गयी थीं|कभी-कभी स्त्रियाँ आपस में बातचीत करते हुवे कहती थी की “हमने भगवान शिव की आराधना करनी  छोड़  दी है |हमें ऐसा नहीं करना चाहिए |भगवान शिव तो सर्वशक्तिमान हैं|परंतु हम अपने पतियों के विरुद्ध भी तो नहीं जा सकतीं |

उनमें से एक स्त्री बोली, “मेरे पति चाहते हैं कि मैं उन्हीं को ध्यान में रखकर मैं अपना सारा काम करूँ|वो अपने आप को भगवान से कम नहीं मानते,इसीलिए भगवान की पूजा करने से मना करते हैं |”फिर वे सभी बेमन से अपने अपने कामों में लग गईं |

दर असल में ऋषि-मुनियों ने वर्षों की तपस्या-आराधना से कई यौगिक शक्तियाँ प्राप्त कर ली थीं|जिसके कारण उन्हें अपनी शक्तियों पर घमंड हो गया था|वे स्वयं को शक्तिशाली मनाने लगे थे |उनको लगता था,कि उनके बराबर कोई दूसरा शक्तिशाली हीं नहीं है|उन्हें सभी देवता अपने आगे बौने प्रतीत होते थे |

Ghamand Kaise Choor Huwa

वे दंभ में अपने आपको ही सर्वशक्तिमान मान बैठे थे |उनको यहीं लगता था कि उनके पास भी देवों की तरह हीं शक्तियां हैं |इसीलिए वे देवों से किसी भी तरह कम नहीं है|

एक दिन  देवर्षि नारद घूमते-घूमते दारुकवन पहुंचे |ऋषियों ने उनका खूब आदर सत्कार किया |ऋषि-मुनियों से बातचीत के क्रम में नारदजी ने ध्यान दिया कि ऋषियों का स्वभाव कुछ परिवर्तित-सा है |वे अपनी शक्तियों और अध्यात्मिक ज्ञान की, अपने ही मुह से अपनी  तारीफ कर रहे हैं |

उन्होंने उस वक्त तो सीमा ही पर कर दिया, जब उनमें से एक साधू बोला,हमारी पत्नियाँ भी हमारी उपलब्धियों से प्रभावित हैं |वे अब भगवान शिव की पूजा नहीं करती हैं |उन्होंने हमारी इच्छा का सम्मान करते हुवे भगवान शिव की पूजा करनी हीं छोड़ दीं |वे हमें अब भगवान शिव से भी महान माँनने लगी हैं | हमारी पत्नियाँ बहुत हीं पतिव्रता और आज्ञाकारी हैं|

जब ऐसी बातें नारदजी ने सुनी तो वे स्तब्ध रह गए |अब वे उन साधुवों को सबक सीखाने की तरकीब सोचने लगे |साधू अपने ज्ञान और शक्तियों का स्वयं ढ़ोल पीट रहे हैं |इनका कुछ तो कुछ करना पड़ेगा|नारद जी ने सोचा,’घमंड’ मनुष्य को पतन की ओर ले जाता है |अतः इन ऋषियों को यथार्थ के धरातल पर लाना हीं होगा|

इनका घमंड तोड़ना ही होगा, अन्यथा ये लोग अपना ही अनिष्ट का बैठेगें |परंतु यह काम भगवान शिव ही कर सकते है |वे हीं इनके घमंड को तोड़कर इन्हें वास्तविक रूप में ला सकते हैं |यह सोचकर नारदजी ने ऋषियों से विदा ली और सीधे कैलाश जा पहुंचे |

कैलाश पर भगवान शिव उस समय ध्यान में बैठे हुवे थे | जब उन्हें किसी के आने का आभास हुआ तो उन्होंने अपनी आखें खोलीं|नारद जी ने सम्मान पूर्वक झुक कर भगवान शिव को प्रणाम किया |

शिवजी ने मुसकुराते हुवे पूछा ,कहो नारद, “धरती वासियों की क्या खबर लाये हो |मुझे आशा है, वहाँ पर सब कुशल मनागल होगा|” नारदजी ने कहा,”भगवान!पृथ्वी पर सुख और शांति है |” परंतु दारुकवन के ऋषि- मुनि अपनी उपलब्धियों के मद में चूर हैं|” यह  कहकर नारदजी अपने और ऋषियों के बीच हुवे वार्तालाप भगवन से विस्तार पूर्वक कह सुनाया|

भगवान शिव ने पूरी बात बड़े धैर्य पूर्वक सुनी और बोले,”नारद! लगता है इस विषय में मुझे ही कुछ करना पड़ेगा|घमंड कभी भी किसी के सिर पर नहीं चड़ना चाहिए |यह किसी के लिए भी अच्छा नहीं होता है |

अहंकार नहीं करना चाहिए

अब उधर एक दिन दारुकवन के साधुओं को वहाँ के राजा ने राजधानी आने का निमंत्रण भेजा|चूंकि राजा ने यज्ञ का आयोजन किया था,जिसमें सम्मलित होने के लिए ऋषियों को निमंत्रण भेजा था |अतः वे सभी यज्ञ मे शामिल होने के लिए राजधानी चले गए|उनके पीच्छे उनकी पत्नियाँ अपने -अपने कामो में व्यस्त हो गईं |

उसके कुछ ही समय बाद उन्हें अचानक हवा के साथ-साथ बहती हुई एक मधुर ध्वनि सुनाई दी,”माई भिक्षाम देही|”यह आवाज सुनकर स्त्रियों का ध्यान भंग हो गया|इस आवाज में न जाने कौन -सा आकर्षण था, कि सभी अपने-अपने काम को छोड़कर उसी आवाज की ओर निकल पड़ी |वे समझ नहीं पा रही थीं, कि आखिर इस घने वन में आवाज कहाँ से आ रही है |

आवाज के जादू में खिचे जब वे घने वन के बीचों-बीच पहुँचीं ,तो वहाँ देखा एक अंजान युवक साधू के वेश में खड़ा है| उसके व्यक्तित्व में विचित्र आकर्षण है |उसके एक हाथ में एक कटोरा और एक हाथ में पानी का बर्तन था |उस युवक का आकर्षण व्यक्तित्व को देखकर सभी स्त्रियाँ मंत्रमुग्ध हो गईं |

यहाँ तक कि वे अपने घर के काम काज को भी भूल गईं |सभी स्त्रियाँ उससे बात करने के लिए लालायित थीं|उन्होंने उससे भोजन और पानी के लिए पूछा |इस तरह वे सभी उस साधू युवक को प्रसन्न करने में लग गयी |

उधर राजधानी में ऋषि-मुनि यज्ञ में व्यस्त हो गए थे |लेकिन जैसे हीं ऋषि-मुनि यज्ञ समाप्त करके उठे ,वैसे ही नारद अपनी योजना के अनुसार वहाँ पहुँच गए | उनके आशानुसार ऋषियों ने फिर से अपनी प्रसंशा करनी शुरू कर दी ” हमने अभी अभी शाही महल पवित्र यज्ञ समाप्त किया है|राजा ने प्रसन्न होकर हमसे कुछ दिन राजसी आतिथ्य स्वीकार करने को कहा है|” वे देवर्षि नारद को प्रसन्न करना चाहते थे |

घमंड कैसे तोड़ा शिव ने

उन्हें ऐसा करते देख नारदजी अपनी हंसी छुपाते हुवे कहा , ” मैं अभी दारुकवन से आ रहा हूँ |वहाँ पर एक साधू कि तरह दीखने वाला युवक आया हुआ है |जिसके चारों तरफ तुम्हारी पत्नियाँ घूम रही हैं |वे अपनी सुध-बुध भूलकर उसकी सेवा में लगी हुई हैं |ऋषियों ने नारद की इस बात पर अविश्वास व्यक्त  किया |

तब नारदजी ने व्यंग कसते हुवे कहा ,” यहाँ रुकने से अच्छा है, कि तुम अपने-अपने घर लौट जाओ और वहाँ जाकर देखो कि वहाँ क्या  हो रहा है|” नारद की बात सुनकर साधुओं को विश्वास तो नहीं हो रहा था परंतु नारद कभी असत्य नहीं बोलते|इसीलिए उनकी बात पर अविश्वास भी नहीं किया जा सकता था|

तब सभी साधु  दारुकवन की ओर तुरंत चल पड़े |आखिरकार यह उनके मान का प्रश्न था |कोई अजनबी युवक उनकी अनुपस्थिति में उनकी पत्नियों को गलत रास्ता दिखा रहा था ।उन्हें बहका रहा था |जब दारूकवन पहुँचकर वहाँ का दृश्य देखे तो, उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था | 

उनकी पत्नियाँ जो कभी अपरिचित पुरुष की ओर  देखती नहीं थी, वह इस अपरिचित पुरुष के आगे-पीछे घूम रही हैं |वे अपने सारे काम छोड़कर इस पराए पुरुष को प्रसन्न करने में लगी हुई हैं |यह दृश्य देखकर ऋषियों को भारी ठेस लगी |उनकी पत्नियाँ उस यूवक के सेवा में लगी हुईं रहीं |

ऐसे में वे सभी देखी हीं नहीं ,कि उनके पति लौट आए हैं |यह सब देखकर साधुओं को क्रोध आ गया |वे युवक से बोले,”कौन हो तुम ?तुम्हारा इतना साहस की हमारे अनुपस्थिति में हमारी पत्नियों को पथभ्रष्ट करो|”

इन शब्दों से वह युवक तनिक भी भयभीत नहीं हुआ,और शांत स्वर में बोला,”आप लोग यह आरोप लगाकर अपनी मर्यादा को लाँघ रहे हैं |उल्टे आप आतिथ्य धर्म भूल रहे हैं|”युवक की इस बात ने आग में घी का काम किया |ऋषियों ने उसे सबक सीखाने की ठानी |उन्होंने अपनी शक्तियों से उत्पन्न चूर्ण उस युवक पर फेंका |

उस चूर्ण के स्पर्श मात्र से ही व्यक्ति नष्ट हो जाता था| परंतु उस युवक पर इसका कोई असर नहीं पड़ा |उल्टे उसमें एक नई ऊर्जा का संचार होने लगा |वह युवक तुरंत उठकर नृत्य करने लगा |यह देखकर ऋषि आश्चर्य चकित हो गाए| उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था, कि उनकी योग साधना की शक्ति व्यर्थ हो जाएगी |

इस बार उन्होंने  एक भयानक बाघ उत्पन्न किया और उस युवक को मार डालने का आदेश दिया|आदेश मिलते ही उस बाघ ने युवक पर हमला कर दिया |लेकिन युवक ने कुछ ही पल में उसे मार गिराया |फिर उसने बाघ की खाल को उधेड़कर अपने कमर में लपेट लिया और फिर से नृत्य करने लगा |यह देखकर सभी ऋषि दंग रह गए |

इस बार ऋषियों ने अपनी शक्तियों से एक भयंकर जहरीला सर्प उत्पन्न किया और उस युवक के उपर फेंका|उन्हें लगा की यह सर्प उस युवक को मार डालेगा |वे सभी मन हीं मन खुश हो रहे थे |लेकिन ऐसा नहीं हुआ|सर्प उस युवक के गले में जाकर फूलों का सुंदर हार बन गया |

इस प्रकार ऋषियों ने युवक को मारने के लिए कई चमत्कारिक शक्तियों का प्रयोग किया | परंतु सभी प्रयास विफल रहे |अंततः थक कर उस युवक को नृत्य करते देखने लगे |अब तक उनके द्वारा प्रयोग किए गए सभी शक्तियों से युवक में एक नई ऊर्जा का ही संचार हुआ था|अतः वे लोग समझ गए कि युवक के आगे उनकी यौगिक शक्तियाँ बौनी है |

इस बीच युवक का नृत्य देखने के लिए स्वार्ग लोक से देवता भी अवतरित हो गए |देवी सरस्वती वीणा बाजा रही थीं |देवगन ढ़ोल-नगाड़े बजा रहे थे |ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, पार्वती एवं गणेश सहित कई देवता भी वहाँ पहूंच गए |यह दृश्य देखकर सभी ऋषि हैरत में पड़ गए |अंततः नारद जी भी आ गए |

सभी देवताओं को देख ऋषियों को यह अनुभव होने लगा कि यह युवक कोई साधारण व्यक्ति नहीं है |हो ना हो यह सर्वशक्तिमान भगवान शिव हैं |उनका नृत्य उनकी विजय का प्रतीक है |साधुवों के अभिमान का नाश कर वे प्रसन्न मुद्रा में नृत्य कर रहे थे |

ऋषियों को अपने अहंकार पूर्ण व्यवहार पर अत्यधिक लज्जा आ रही थी|परंतु साथ हीं वे प्रसन्न थे, कि एक ही साथ सभी देवी देवताओं का दर्शन करने का स्वर्णिम  गौरव प्राप्त हो गया |हम सभी बहुत भाग्यशाली हैं | इसके अलावा भगवान शिव का दिव्य नृत्य भी देखने को मिला |

अब सभी साधुओं को अपनी भूल का अनुभव हो चुका था |फिर उन सबने भगवान शिव के चरणों में गिरकर माफी मांगते हुवे कहा,”हे सर्वशक्तिमान ,भोले भण्डारी !हमें क्षमा कर दीजिये |हम अभिमान के मद में बहक गये थे |”

भगवान शिव का प्रयोजन अब पूर्ण हो गया था |ऋषियों की बुद्धि ठीक हो गई थी |अतः भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद देते हुवे कहा,”इसमें कोई संदेह नहीं कि आप सभी महान हैं |परंतु आपका अभिमान आपकी महानता को नीचे गिरा रहा था|

मैं तो सिर्फ आपके अभिमान रूपी बीमारी का उपचार करना चाहता था |मुझे प्रसन्नता है, कि आप सभी को अपनी भूल पर पश्चताप हो रहा है |अब आप सभी कभी अभिमान को अपने ऊपर हावी मत होने देना |अभिमान सदैव पतन का कारण बनाता है|” यह कहकर भगवान शिव अंतर्ध्यान हो गए |

इस प्रकार सभी ऋषि भगवान शिव द्वारा क्षमा किए जाने पर अत्यंत प्रसन्न थे |उन्होंने प्रतिज्ञा की,वे अब कभी अभिमान और अहंकार को अपने आसपास फटकने नहीं देंगे |  

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