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उद्धव गोपी संवाद।

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 उद्धव गोपी संवाद।Uddhav Gopi Samvad

एक दिन उधवजी कृष्णजी के शयन कक्ष( bedroom)में पहुंचे। उन्होंने देखा कि कृष्णजी बेतहाशा रो रहे थे। उधवजी कृष्णजी की इस स्थिति को देखकर बोले- गोबिन्द ! तुम रो  रहे हो। कृष्णा मुस्कुराते हुए बोले नहीं सखा, मैं नहीं रो रहा हूँ। उधव ने कहा- अच्छा अभिनय कर लेते हो।

कृष्णजी उधवजी को बाहों में भर कर कहतें हैं कि, “उधो मोहे ब्रज विसरत नाही”। रूदन करने लगते हैं। मोहे यशोदा मैया की बहुत याद आती है। जब जब गोपियां याद करतीं हैं, तो मेरे हृदय में बहुत पीड़ा होती है। वह सभी ब्रज में रोती है ।मैं यहाँ रोता हूँ।

परन्तु उधवजी को तो अपने ग्यान पर बहुत अभिमान था। कृष्णजी ने कहा-हे उधव! आप ब्रज जाएँ और गोपियों को अपने ग्यान से लाभान्वित करें। हो सकता है कि आप के ग्यान से उनकी विरह वेदना कम हो जाये।

उधवजी ब्रज जाने के लिए तैयार हो गए। कृष्णजी ने सोने का रथ और अपना पोशाक पिताम्बर मुकुट यानि अपने स्वरूप में सजाकर उधवजी को ब्रज के लिए तैयार कर दिया।

उधवजी ब्रज की ओर निकल पड़े। जैसे ही रथ ब्रज की नगरी में प्रवेश किया, वैसे ही ब्रज के कांटे, झूरमट राह रोक दिये, और कहने लगे-उधवजी आप यही से लौट जाइए। नहीं तो आप को भी हमारे जैसे दर्द सहना  पड़ेगा।

 ब्रज में ब्रह्म ग्यानी उद्धव का क्या हाल हुआ?.

उधवजी अपने ग्यान में लीन ब्रज नगरी में प्रवेश करते हैं। रथ को आते देख सभी गोपियां दौड़ी भागी गोविन्द आ गयो, गोविंद आ गायो है।
आप कौन हो? हमारे कन्हैया के  भेष में आये हो। उधवजी कहते हैं कि मैं कृष्ण का संदेश वाहक हूँ। इतना सुनते ही गोपियां उधवजी का बहुत ही श्रद्धा से स्वागत करती हैं ।
तत्पश्चात पूछती हैं, बोलो क्या संदेशा लाये हो। मेरा कान्हा कैसा है ? कान्हा क्या हमें  याद  करता है बोलो ना। उधवजी संदेश के वजाय निर्गुण ब्रह्म का ग्यान देने  लगते हैं। उधवजी अपना ग्यान अपने पास रखें।
हमारा एक ही हृदय है। दस बीस नहीं  है, जो हम आपके निर्गुण ब्रह्म की उपासना करे। हम तो कृष्णा से प्रेम करते हैं। हम सभी उन्हीं  के प्रेम में लीन रहते हैं । हमारा मन तो उन्हीं के साथ मथुरा चला गया है।
हे उधव! हमारा कृष्णा हमें यमुना के तट पर बंशी सुनाया करता था। हमारे वस्त्र चुराया करता था। हमारी मटकी फोड़ दिया करता था। क्या वह हमें बिल्कुल याद नहीं करता?
सवाल पे सवाल, सवाल पे सवाल गोपियां उधवजी से पूछे जा रही थीं। अपने साथ गुजारे एक- एक पल को उधवजी से बया कर रहीं थीं। नयन यानि आंखो से निरंतर अश्रु बहे जा रहें थे। सभी यहीं पूछे जा रही थीं कि, क्या गोविन्द मुझे याद करता है?
उधवजी को खींचते हुए गोपियां  एकांत में ले जाती हैं।सभी उन्हें घेर लेती है  और विलख विलख करूण वेदना से पूछती हैं। हमारा नाम लेता है न कन्हैया! यह सब देखकर उधवजी एक पत्र गोपियों के देते हैं।

उद्धव ब्रज से क्यों लौट कर आ जाते हैं?

गोपियां उस पत्र को ऐसे लपकती हैं कि, मानो उनका गोविन्द ही हो। जब पत्र पढ़ने के लिए खोलती हैं तो, उसमें कुछ नहीं लिखा होता है। तब वह फाड़ कर फेंक देती हैं। उधवजी उस फटे पत्र को उठाकर कहते हैं कि तुने इसे क्यों फाड़ दिए?
जानती हो यह पत्र स्वयम् परब्रह्म के हाथ का लिखा हुआ  था।इसमें गुढ ग्यान था। जिसे पाने के लिए ऋषि मुनि जंगलों में वर्षों तपस्या करते हैं। तब गोपियां उधवजी से कहतीं हैं, तो इस गुढ ग्यान को ले जाते ऋषि मुनियों के पास। हम गंवारन के पास क्यों ले आये?
उधवजी कहते हैं – तुम्हारे  कल्याण के लिए लाया हूँ ।शारीरिक मोह से बाहर निकालने के लिए।  इसमें उन्होंने यह लिखा था कि तुम लोग जिस मेरे सुन्दर शरीर से प्रेम करती हो, वह शरीर नश्वर है। एक दिन वह नष्ट हो जाएगा। इसीलिए इस मोह को तोड़ो।

जाने गोपियों का प्रेम  ब्रह्म ज्ञानी उद्धव पर कैसे भारी पड़ा?

गोपियां रोती हुई कहती हैं- वहीं नर्मी है इस पत्र में , इसके स्पर्श में वहीं गर्मी है,जो मेरे कृष्ण कन्हैया के हाथों में है? क्या हम उसे गले लगा सकते हैं? उधवजी कहते है- नहीं! नहीं!नहीं। वह तो सर्वत्र है। वह न कभी पैदा होता है, न कभी मरता है। नहीं वह कहीं आता है, न कहीं जाता है। न उसके नयन  है ,न हाथ है। 
यह सुनकर गोपियां उधवजी से कहतीं हैं- तब हमारी भेंट गोविन्द से कहाँ होगी उधव भैया? उसके हाथ नहीं तो वो हमे कैसे स्पर्श करेगा? उसके नयन नहीं तो, वो हमे देखेगा कैसे? यदि हमें कोई देखने वाला ही नहीं तो हम किसके लिए सजेगे?
इस संदेश में वो लिखा है कि हम उसे भूल जाए। कहीं वो पागल तो नहीं हो गया है। वास्तव में ये मथुरा वाले छल बल करने में बहुत ही माहिर हैं। पहले वो क्रूर आया और न जाने कान्हा को क्या पाठ पढ़ाकर लेकर चला गया।
अब आप आए ब्रह्म ग्यान देने। जाइए उसे कह दीजिये कि हमें  यह उपदेश नहीं दे। पहले ही हम उसकी जुदाई सहन नहीं कर पा रहे हैं। उपर से  यह दारूण संदेश। उसे जाकर कहिये-हमें प्रेम मार्ग से नहीं हटाये।
उधवजी कहते हैं कि प्रेम एक ऐसा मोह का दलदल है जिसमें जो फसेगा वो आवश्य दुख पायेगा। इसीलिए तो मैं कहता हूँ कि इस अंधकार से निकाल कर ग्यान के प्रकाश में आओ! जहाँ न मिलने का सुख है! ना विछडने का दुःख!। केवल आनंद ही आनंद है।
ऐसे जीवन जीने  से क्या लाभ उधवजी?  जिसमें न मिलने का सुख है ना विछडने का दुःख। जीवन का अर्थ है परब्रह्म की प्राप्ति। उधवजी, जो अपने प्रेम को नहीं पा सकी, वह परमात्मा को क्या प्राप्त करेगी ?
उधवजी कहते हैं, जब परमात्मा की प्राप्ति हो जाएगी तो कोई पीड़ा नहीं रहेगी। सब शान्त हो जाएगा। गोपियां कहतीं हैं-सब शान्त हो जाएगा ….जैसे…शव शान्त हो जाता है, है न उधव भैया।
उधवजी विरह का पीड़ा आप जानते हैं? विरह के पीड़ा में जो पीड़ा है वही आनंद है।  उधवजी- हा हा विरह के पीड़ा मेंआनंद। गोपियां- आनंद ही नहीं उधवजी विरह के पीड़ा में परमानंद है। उधवजी क्या  आपने कभी प्रेम किया है? उधवजी- ग्यानी कभी प्रेम जाल में नहीं फँसता।
गोपियां-अरे, प्रेम का तो ग्यान ही नहीं,  ग्यानी कहते हो अपने आप को। उधव भैया पहले प्रेम करो तब जानोगे कि प्रेम के पीड़ा में इतना आनंद क्यों है? उसके बाद ही तुम ग्यानी बनोगे। अभी तुम्हारा ग्यान अधूरा है।
वहां से गोपियां उधवजी को राधा के पास लेकर जाती है। जहाँ राधा कृष्ण के वियोग में बैठी है। गोपियां कहतीं हैं देखो राधा ये उधवजी कान्हा का संदेश लेकर आए हैं कि हम तप योग करें और कृष्णा को भूल जाए।
यह सुनकर राधा जी कहतीं हैं –उधवजी कृष्णा से प्रेम ही हमारा तप योग है। हमारा कल्याण तब होगा जब कृष्ण राधामय और राधा,कृष्णामय  हो जाए। राधा उधवजी से कहतीं है- हे! उधवजी जिस तरह से माँ असहनीय पीड़ा पाकर संतान प्राप्ति का आनंद प्राप्त करती है उसी प्रकार प्रेमिका को  आनंद प्राप्त होती है।
जिसे जीवन में प्रेम का उपहार मिल जाय जो अपने होठों से प्रेम रस का पान कर लिया हो उसे संसार में किसी और रस की आवश्यकता नहीं होती।उसका प्रेमी सदा साथ होता है।  उधवजी कहते हैं मैं नहीं मानता। यह सब झूठी कल्पना  है आपकी राधाजी।
राधा जी कहती हैं- आपको झूठ लग रहा है तो देखिए! कृष्णा मेरे पास ही है। राधा के पास कृष्ण पलक झपकते ही प्रकट हो गए। उधवजी आश्चर्य से कृष्णजी को छूने लगे। प्रभो यह कैसी लीला है ? आप यहाँ हैं कि वहां है?
उधव भैया मैंने आपसे कहा था न, कि मैं तो केवल प्रेम के बस में हूँ। मेरा प्रेमी जहाँ बुलाएगा मैं वहीं हूँ। वास्तव में मैं सब जगह हूँ। बस दिखता नहीं हूँ। जैसे अंधकार में पड़ी  हुई वस्तु दिखाई नहीं देती है।
जैसे ही दीपक जलता है और वह वस्तु दिखाई देती है उसी प्रकार  यदि मुझे देखना हो तो प्रेम और भक्ति का दीपक जलाओ। मुझे वहीं खड़ा पाओगे। यहीं परम सत्य है उधव भैया और यही परम ग्यान है।

उधवजी को मिल गयो सांचो प्रेम प्रमाण,

भरम गयो संशय गयो जागो सांचोग्यान “

उधवजी प्रेम भक्ति देखकर कृष्णजी के चरणों में गिर जाते हैं और प्रेम भक्ति में लीन हो जाते है। ब्रह्म ग्यानी उधवजी ब्रज से राधे राधे जपते जपते लौट आते हैं।
“चाहे प्रेम पिता पुत्र का हो , भाई बहन का हो,  माँ बेटी का हो, पति पत्नी का हो या मित्र का हो ,जुदाई में दर्द होता ही है।”

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धन्यवाद दोस्तों

संग्रहिता-कृष्णावती कुमारी

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